एक डिपाजिटरी एक केंद्रीय बैंक की तरह शेयरो तथा प्रतिभूतियो का सुरक्षित रखरखाव करता है,जेसे रूपये पैसो को रखा जाता है। जिस प्रकार हम बैंक से पैसे निकलने के लिए चैक जरी करते है ठीक वेसे ही ब्रोकर ,निवेशक को डिपाजिटरी से प्रतिभूतियो की सुपुर्तागी हेतु डेबिट निर्देश जारी करते है,तथा क्रेडिट करने के लिए पे-इन-स्लिप जरी करते हे ।डिपाजिटरी का भारतीय निवेश बाज़ार में अहम् भूमिका होती है। यह किसी भी तरह के निवेश सम्बन्धी, अधिकार कागजातों के वहन से निजात दिलाता है।जिससे उस कागजात के घूम जाने, नष्ट हो जाने,चोरी हो जाने आदि के खतरे समाप्त हो जाते है। डिपाजिटरी में अंशधारक या शेयरहोल्डर के अनुरोध पर डिपाजिटरी भागीदार के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रतिभूतियो को धारण करता है।
डिपाजिटरी की परिभाषा :- डिपाजिटरी अधिनियम 1966 धारा 2e के अनुसार ,डिपाजिटरी का आशय कंपनी अधिनयम 1956 के अधीन निर्मित एवं पंजीकृत एक ऐसी कंपनी से है, जिसे भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड अधिनयम 1992 की धारा 12 के अधीन प्रमाणपत्र दिया गया हो।कोई डिपाजिटरी एक डिपाजिटरी तब तक नहीं हो सकती जब तक उसको सेबी से प्रमाण पत्र न दिया गया हो।डिपाजिटरी द्वारा धारित सभी प्रतिभूतिया अभोतिकिकृत अर्थात इलेक्ट्रोनिक रूप में होगी।इसकी सेवाए लेने हेतु निवेशक को बैंक की भांति एक खता खोलना होता है जिसे डी मेट खाता कहते है।
शेयर तथा ऋण बाज़ार में अभी दो डिपाजिटरी द्वारा सेवाए दी जा रही है,
1. नेशनल सिक्योरिटीज डिपाजिटरी लिमिटेड (NSDL)
2.सेंट्रल डिपाजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (CDSL)
ये दोनों कंपनिया लिस्ट होने वाली कंपनी,निवेशको ,म्यूच्यूअल फण्ड था अन्य बाज़ार के हिस्सेदारों को अभोतिकीकरण का लाभ उपलब्ध करवाती है।
डिपाजिटरी को एक लाभ प्राप्त करने वाले अधिकारी के लिए किसी प्रतिभूति के स्वामित्व को बदलने या किसी और के नाम करने के लिए पंजीकृत स्वामी माना जायेगा। पर डिपाजिटरी अपने मन से किसी भी प्रकार का फेर बदल या शेयर दुसरे के नाम करना आधी नहीं कर सकती इसके लिए उसको उस प्रतिभूति के स्वामी से डेबिट निर्देश प्राप्त करने होंगे।पंजीकृत स्वामी की जगह भले डिपाजिटरी के नाम लिखे हो पर उन प्रतिभूतियो का लाभ उसके असली स्वामी यानि निवेशक को प्राप्त होगा, और प्रतिभोती का रख रखाव डिपाजिटरी करेगी जिसके बदले वह निवेशक से कुछ फीस लेगी।यदि डिपाजिटरी रखरखाव में भूल चुक करती है और निवेशक को परेशानी होती हे या उसको नुकसान होता है, तो इसके लिए डिपाजिटरी बीमा करवा के रखती है।तथा इस नुकसान के प्रति उत्तरदायी होती है, था इसका भुकतान निवेशक को करती है।
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